बेजान जान मन चैन है खोया
मद्धम है स्पंद हृदय का
साँसों की सरगम होठों से
करती है विनय प्रणय का
आह्लादित कर देती मन को
कुछ जानी अंजानी बातें
रोमांचित कर देती तन को
सतरंगी सपने किसलय का
© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)
07-06-2008
मद्धम है स्पंद हृदय का
साँसों की सरगम होठों से
करती है विनय प्रणय का
आह्लादित कर देती मन को
कुछ जानी अंजानी बातें
रोमांचित कर देती तन को
सतरंगी सपने किसलय का
© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)
07-06-2008
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