Wednesday, 24 September 2014

घोघ उठिते धरि बिगरि गेलय

गजल–2

घोघ उठिते धरि बिगरि गेलय
बात सीधा जे छल ओनरि गेलय

बंद बोतल शराब जकाँ छल
ओ खुलिते जेना चहरि गेलय

रूप पछवा देखि सिहकल मोन
पोरे-पोर जेना सिहरि गेलय

मजलिस मे जिनकर चर्चा छल
ओ नजरिमे एखन उतरि गेलै

नीतीशकेँ दूरेसँ सिहावइ छल
ओ दिन छल आब गुजरि गेलय

सरल वार्णिक बहर

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

Tuesday, 23 September 2014

हम छी आइ बड्ड उदास तोरा बिनु

हम छी आइ बड्ड उदास तोरा बिनु
जिनगीमे किछु नै छै खास तोरा बिनु

मुँह मोडि लेले नै घुरि कऽ तकले तूँ
दुनियासँ करब की आस तोरा बिनु

चारु दिस महले महल ऐँठाँ मुदा
एहि शहरमे नै छै बास तोरा बिनु

हिया बनि गेल अछि नीरस एहन
नै बीते दिन राति आ मास तोरा बिनु

जीविते जिनगी मरि रहल नीतीश
आगू चलत कोना ई सांस तोरा बिनु

सरल वार्णिक बहर

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

Monday, 22 September 2014

अलमस्त जवानी के आगे,सब रंग जमाने के फीके

कुछ रंग है दीप दीवाली के
कछ रंग है रंग रंगोली के
कुछ रंग रंगीली दुर्गापूजा
कुछ रंग गुलाले होली के

कुछ रंग नमाजे मस्जिद के
कुछ रंग है चर्च शिवाले के
कुछ रंग है सूरज किरणों के
कुछ रंग है चाँद सितारों के

कुछ रंग अजंता मूरत की
कुछ रंग इबादत नज़रों की
कुछ रंग कविता हर्फो की
कुछ रंग है सजदा ज़ुल्फो की

कुछ रंग साकी पैमाने की
कुछ रंग जामे मैखाने की
कुछ रंग आँखों से पीने की
कुछ रंग बहक जाने की

कुछ रंग बसंती चमकीले
कुछ रंग सतरंगी पनसोखे
कुछ रंग हिना सज़ा संवरा
कुछ रंग लगे खाली खोखे

कुछ रंग लगा हल्का हल्का
कुछ रंग बहुत ही है चोखे
अलमस्त जवानी के आगे
सब रंग जमाने के फीके

© नीतीश कर्ण
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Thursday, 18 September 2014

नाम मेटायल,पहिचान हरायल

नाम मेटायल,पहिचान हरायल 
समय आयब गेल, अर्जन करू
चुप रहब, इतिहास मेट जायत
शेर छी आँहा गर्जन करू !!!
© नीतीश कर्ण
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बिसरी गेल लोक गीत गोसाउनिक

बिसरी गेल लोक गीत गोसाउनिक, मारा-माछ आ मरुआ
मायक हाथ'क कुम्हरौरि, आ तिलकोर’क तरुआ

बिसरी गेल लोक पाग आ चानन, ओ अरिपन’क रीत
ठकरल टीक आ थिकरल धोती, ओ विद्यापति'क गीत

बिसरी गेल लोक माँटि'क चुलहा, अंगना के तुलसी चौरा
पेठीया के मूरही-कचरी-झिल्लि आउर सिंघारा

बिसरी गेल लोक गामक भोरहुकबा, ओ कौआ के कुचरल, अनघोल करैत सुगना
ओ बाबा वाला बडका दरव्वजा, बाबु-पितिया के साझी अंगना

बिसरी गेल लोक अपन राग-भाष, अपन साजो-सज्जा
ओ साँझी आउर पराती, ढोल-पिपही वाला बाजा

© नीतीश कर्ण
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हम सक्षम छी,हम सबल छी

हम सक्षम छी,हम सबल छी
हम रणचंडी सन प्रबल छी
हम नागार्जुन क विचार छी
हम कोशी के धार छी

मिथिला राज्य अधिकार हमर अछि
मिथिले सs सरोकार हमर अछि
हम मिथिला मिथिला हमरा में
मिथिले जीवनक सार हमर अछि

हम महादेव क तेसर नेत्र छी
हम मॅंडन आयाची कs क्षेत्र छी
हम विद्यापतिक बयना छी
हम मिथिला राज्य निर्माण सेना छी


© नीतीश कर्ण
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जागू मैथिल भोर करू

माय मिथिला के पैर में बेरी,गुमनाम मैथिल संस्कार
मंगला सs तs भीख ने भेटत,लईड कs लिय अपन अधिकार

जनक ऋषि के वन्सज के, गरम खून किया पड़ल शिथिल
लेभरायल आँखिक काजरि, उजड़ल - उपटल माँ मैथिल

उपेक्षित जिंदगी बड जिलउँ,आब ने कनिको धीर धरू
बेर आईब गेल फूंकु पाञ्चजन्य,हर-हर महादेव उद्घोष करू

खून बिना आज़ादी कहाँ, आब उठाबू तीर-कमान
कटइ छई तs कईट जाओ गर्दन, बनल रहे पागक सम्मान

आशीर्वाद कोशी गंडक के, देखा दियउ रूप विकराल
माय मिथिला चित्कारि रहल अछि, बहा दियउ शोणित के धार

लिय टेंगारी लाठी भाला, परशुराम के रूप धरू
घोर अन्हरिया राइत बहुत भेल, जागू मैथिल भोर करू

© नीतीश कर्ण
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मद्धम सी चाँदनी, हवा की सरगोशियाँ

मद्धम सी चाँदनी, हवा की सरगोशियाँ
शबनमी रात और, सुरमयी आँखें

कारी बादर के ओट से, शर्माती चंदा
जैसे चिलमन से झाँकती, मनचली आँखें

कलियों पर गिरती, क्षितिज से ओस की बुन्दे
नज़रों सी फिसलती, मरमरी आँखें

रातें अधूरी, बातें अधूरी
आमंत्रण दे रही, कोई स्वप्निल आँखें

मोम सा यौवन, और सांसो की गर्मी
झील सी गहरी, रसभरी आँखें

बयान कर रही है सिलवटें, रात की कहानियाँ
करवट बदल रही है, उनिन्दी आँखें

कभी नज़रें झुका रही है,कभी नज़रें चुरा रही है
आँचल में शर्म से, बोझिल आँखें

© नीतीश कर्ण
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Monday, 15 September 2014

तेरे शहर से अपने सारे राहों को मोड़ आया हुँ

तेरे शहर से अपने सारे राहों को मोड़ आया हुँ
तुझसे जुड़ी हर कसमें, रिवाजों को तोड़ आया हुँ

वो चाँद सी सुरत, वो चाँदी सी रंगत
उस गली में मस्त, ईशारों को छोड़ आया हुँ
मेरा एक मिस्ड कॉल, और तेरा आना छम से
उस नज़रों के हर ईक, नज़ारों को छोड़ आया हुँ
वो दोस्तों की महफ़िल, दिवानगी की बातें
उस छत पे चाँद, सितारों को छोड़ आया हुँ
वो सुबह की पूजा, वो शाम की इबादत
उस शहर के मस्जिद शिवालों को छोड़ आया हुँ
ऐ दोस्त गर मिल जाए, तो संभाल कर रखना
वहीं कहीं रातों की निन्द, दिन के करारों को छोड़ आया हूँ

© नीतीश कर्ण
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बहके हुए अरमान सारे

बहके हुए अरमान सारे
तनती हुई साँसों की डोर

धड़कनों का शोर चुप-चुप, तुम सुनो ना..
घुलती हुई खुश्बु फ़िज़ा में
उरती हुई रंगत गुलाल
गाते हुए कोयल को फाग, तुम सुनो ना..
शबनमी कलियों का दामन, चटकीले चंदा का मन
रागनी का गीत चुप-चुप, तुम सुनो ना..

© नीतीश कर्ण
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हम छी बड उदास तोरा बिन

हम छी बड उदास तोरा बिन
जिनगी में किछु नई खास तोरा बिन

मूह मोईड कs गेले ने तकले घुईर कs
दुनिया सs फेर की आस तोरा बिन

कना जाइये देखि कs तोहर घरक रस्ता
ई शहरि मे आब नई बास तोरा बिन

© नीतीश कर्ण
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प्रेमक बसात

प्रेमक बुन्नी उमरि- उमरि, आई हमरा पर बरसल
हमर करेज के परती बारी में, प्रेमक गाछ आई उपजल

की जाने औ कौन मौसम छल, की जाने औ कौन नक्षत्र
हमर मनक अन्हार कोठरी में, भेल कोना इज़ोर सर्वत्र

आई धरि नई सोचलउं सपनों में, हमरो पर ई बरखा बरखत
मिलते देरी नैन नैन स’, हमरो पर ई बिजुरि करकत

नैन झुकेने ओ बैसल छल, मिलते नैन की जादू केलक
किछु कहितहुं किछु बाजि नई सकलहुं, की जाने कोन मन्त्र ओ पढ़लक

जानि प्रेमक मौसम छल ओ, किछु हमहुं अंदाज लगेलउं
कोना भिजलउं से बुझि नई सकलउं, तै बरसातक लाथ लगेलउं

© नीतीश कर्ण
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अपनी आँखों से इक बार पिला दे साकी

अपनी आँखों से इक बार पिला दे साकी
इस दिवाने को भी मयकसी सिखा दे साकी

गिरता है तो गिर जाने दे दिल पर बिजली
अपने मुखड़े से तू चिलमन हटा ले साकी

झुलस रहा है मेरा दिल आतिशे गम में
आके तु मलहम लगा दे साकी

लोग कहते हैं थोड़ा उलझा हुँ मैं
अपने जुल्फ की तरह मुझको भी सुलझा दे साकी

छोड़ दूंगा पैमाने-पैमाने की आदत
ईक बार अपने आँखों से पिला दे साकी

दिल की हसरत पूरा कर दे मेरे जाने से पहले
सारा मयखाना अपने हाथों से पिला दे साकी

© नीतीश कर्ण
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तुझ बिन प्यासी जलज पंखुड़ी

तुझ बिन प्यासी, जलज पंखुड़ी
सुन श्याम वर्ण, मदमस्त अलि

तेरे बिन कोई, तीज-पर्व क्या
तुझ बिन, कैसी दिवाली

© नीतीश कर्ण
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जिंदगी की डोरी

जिंदगी की डोरी तनती हुई
अतीत और वर्तमान के बीच
बस टूटने को बेकल है
जाने कब तक संघर्षरत खिंचेगी
याद और यथार्थ के बीच
काश मिट पाती दूरी
याद और यथार्थ के बीच का
लेकिन अब तो टूट चुका है
आशा उस निरीह का
बस टूटने को बेकल है
जिंदगी की डोरी

© नीतीश कर्ण
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उनकी यादें

उनकी यादें
समंदर की लहर की तरह
जो उठती है उपर की ओर रह-रह कर
मानो छुना चाहता हो चाँद को
वैसे तो स्पर्श करती है रोज ही उसकी रश्मियाँ
ठीक उनकी यादों की तरह
कुछ भी तो अंतर नही
उस पगली लहर और मुझमे
मैं भी रह रह कर उठता हुँ
पूरे उमंग से उस लहर की तरह
और फिर थक कर गिरता हुँ नीचे
खो जाता हूँ अतीत के समंदर में

© नीतीश कर्ण
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मन अकेला तन अकेला


मन अकेला तन अकेला
शांत निश्चल जिंदगी

बोझिल पलकें आँसुओं से
उलझी साँसे थकी-थकी

तन्हा दिन बेरंग रातें
उखड़ी उखड़ी करवटें

नींद की भी बेवफायी
बेनूर सी है सिलवटें

ज़िंदगी के बदगुमानी का सज़ा किसको मिले
टूट चुके जब शाख पेड़ से कलियाँ फिर कैसे खिले

© नीतीश कर्ण
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Wednesday, 10 September 2014

किया हम प्रीत लगेलहुँ

कोना सुनाबु हाल बिरह के नोर आँखि में आबईये
करेज मे एकता हुक उठल आ प्राण ठोर ताक आबईये

जानि कोन अपराध केलहु हम, जेकर सजा देलहु आहां हमरा
जिनगी हमर ओई फूल जाकाँ भेल, जेकर रस चुसलक कोनो भंवरा

निश्चहि घोर अपराध हमर छल, जे हम नेह लगेलहुँ
आब अहु सs बढी क सजा देब कि, जिबैत जान लs लेलहुँ

आबि गेल फेर आमक महिना, जखने गाछी में महुआ गमकल
हरियर भेल बेमाय करेजक, सुनबा सs कोयली के कु-कल

नैन बिछेने आइयो बाट पर, पैरा अहिं के तकैत छी
मन पता नै कतs लटकल अछि, नै सुतई छी नै जागई छी

ओहि अतीत मे तकबा के, हम अखनेहु इच्छा रखने छी
मुदा देह हमर सिहरी उठइये, जखन गप्प आहा के करैत छी

किछु बुईझ नै आबि पडेयै एहन कोन जुलुम हम केलहुँ
सभहे किछु गेल हराए, किया हम प्रीत लगेलहुँ

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)