Sunday, 12 October 2014

सब कुछ बदल गया जीवन का, बस एक निशानी बांकी है

ख़त्म हुए अध्याय सुखद, बस एक कहानी बांकी है
सब कुछ बदल गया जीवन का, एक निशानी बांकी है

खत्म हुए वो फेनिल मदिरा, मधुशाला को जो महकाते
टूट चुके वो काँच के प्याले, दीवाने जिसको टकराते

ख़त्म हो गयी मधुशाला, खो गयी कहीं उनकी हस्ती
ख़त्म हो गये दीवाने, उजड़ गयी उनकी बस्ती

पर आज अचानक देखा उनको, नज़रों से नज़रें टकराई
शबनम की कुछ बूँदें फिसली, कमल-पंखुरी ज्यों मुस्काई

ख़त्म ही थी सारी मधुशाला, मूक नयन पहचान नयी थी
उजड़ी रंगत उलझी जुल्फें, पर मादक मुस्कान वही थी

जी भर कर तू आज पिला दे, हो सके मिले फिर मधुशाला
जिंदगी कट जाए नशे में, तू आज पिला दे वो हाला

सांसो मे घुलने दे मदिरा, कसर निकाल लेने दे पूरी
बाहों मे कस कर मरने की, तू मुझको दे दे मंज़ूरी

एक कहानी बीत गया, अब एक कहानी बांकी है
सब कुछ बदल गया जीवन का, बस एक निशानी बांकी है

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

Thursday, 9 October 2014

प्रेम बयार सिहकि गेलय

गजल–3

प्रेम बयार सिहकि गेलय
मोनक पंछी चहकि गेलय

झूकल नैनकेँ उठिते धरि
धाप इज़ोर छिटकि गेलय

नैन नैनसँ मिलिते सउंसे
रातुक रानी गमकि गेलय

ओ पहिल नजरि जे हियमे
सोन सन जे चमकि गेलय

ओ छिलकैत मदिरा नैना स
नीतीश कनि बहकि गेलय

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

Thursday, 2 October 2014

चलती फिरती मधुशाला

अधरों पर मुस्कान सजाये आँखों में सुरमई हाला
यौवन घट छलकाती आयी चलती फिरती मधुशाला

छक कर आज पिला दे मुझको सुर-सुधा स्वप्निल हाला
मद ऋणी रोम-रोम हो जाए तु आज पिला दे वो प्याला

कर लेने दो अरमां पूरी पैमाना भर लेने दो
तुम ही मेरी साकी सुरा हो तुम ही मेरी मधुबाला

आँखों से होकर उतरेगा सुरमई रूप का जब प्याला
जीवंत होंगे आँखों के आगे खुज़राहो की सुरबाला

रूप मधुमती तेरे नखड़े जी भर के आज उठाउंगा
मैं आवारा बंजारा तुम चलती फिरती मधुशाला

अधरों पर लेलो चुंबन तू साँसों को टकराने दो
बाहों मे कस ले मुझको धड़कन का शोर सुनाने दो

अंजुरियाँ भर-भर कर पी लूं छोड़ के चिंता जनम मरण की
मैं जनम जनम का प्यासा राही तुम चलती फिरती मधुशाला

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

Wednesday, 1 October 2014

देखा है आज मैने इक उनिन्दी आँखें

देखा है आज मैने इक उनिन्दी आँखें
बोझिल पलकें थी सपनों से शायद
जैसे रात भर जगी हो अपलक चंदा
की जैसे नज़र आई हो गुलाब के पंखुड़ियों पर फिसलती शबनम
मानो जल उठी हो रात के शबनम सवेरे-सवेरे
देखा है आज मैने इक उनिंदी आँखें
बोझिल पलकें थी सपनों से शायद...!


© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)