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Tuesday, 25 May 2021

सर्वस्व न्यौछावर करके कोई , कैसे सर्वोच्चता पा लेता है ।

 सर्वस्व न्यौछावर करके कोई , कैसे सर्वोच्चता पा लेता है ।

अपनी बिरहा भूल के कैसे , औरों के खुशियों पे गा लेता है ।
कैसे कोई भुला देता , दिल भेदने वाले दारुण क्षण ।
कैसे कोई मना लेता , बोझिल पलकें टूटे मन ।
दिव्य सरल पर , मूक सी अविचल ।
छटा बिखेरती , हर छिन हर पल ।
गम की दाग छुपाती चंदा , तारों की झुरमुट में ।
© नीतीश कर्ण

Wednesday, 29 June 2016

जाती हो तो जाओ ...

मौसम बेवक्त ही बरसेंगे 
नैन दरश को तरसेंगे 
मौन जुबां बस रह जायेगा 
जाती हो तो जाओ ...

स्वप्निल आँखें सूने होंगे 
जिवन किसलय मुर्झायेंगे 
शबनम को तृण तरसेगा 
जाती हो तो जाओ ...

खाली करवट रातें होगी 
बेनूर सिलवट सौगातें होगी 
बाती संग दिल भी जलेगा 
जाती हो तो जाओ ...

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

Thursday, 13 August 2015

तेरी होठों पे अटकी वो पानी की बूंदें

तेरी होठों पे अटकी वो पानी की बूंदें
और अंगुली से हटाना तेरा

नजरें झुका के मुस्कुराना धीरे से
फिर हौले शर्माना तेरा
© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

Thursday, 26 February 2015

इक सांवरी की तिरछी निगाहें

नील वसन में लिपटी हुई मद भरी चंचल अदायें
वृन्दावन की रासलीला इक सांवरी की तिरछी निगाहें

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

Saturday, 10 January 2015

शाम होते ही यादों की शमा जल जाती है

शाम होते ही यादों की शमा जल जाती है
जिंदगी के कारवाँ को रौशनी मिल जाती है
रात होते ही महक जाती है चंपा बेलियां
ये चाँदनी नवयौवना सी कर रही अठखेलियां

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

Sunday, 4 January 2015

सतरंगी सपने किसलय का

बेजान जान मन चैन है खोया
मद्धम है स्पंद हृदय का

साँसों की सरगम होठों से
करती है विनय प्रणय का

आह्लादित कर देती मन को
कुछ जानी अंजानी बातें

रोमांचित कर देती तन को
सतरंगी सपने किसलय का

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)
07-06-2008

Friday, 2 January 2015

मन की सीमा रेखा

मन की सीमा रेखा
आकाश सा अनंत
और उस अनंत सागर में
बादलों की कश्ती पर
हिचकोले खाते हुए हम तुम
रोमांचित होते हुये
लहरों के थपेड़ो से
हाथ थामे हुये एक दुसरे का
ज़ोर से कस कर

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)



देकर अश्क आँखों में हंसायेगा कौन

देकर अश्क आँखों में हंसायेगा कौन
रूठ जाउं अगर मैं तो मनायेगा कौन

बालों की तरह उलझी उलझने सारी
मैं गर चला गया तो सुलझायेगा कौन

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

Saturday, 13 December 2014

चिरनिंद्रा में सो जाउं मैं

तेरे घर की रौशन खातिर
बाती बन जल जाउं मैं
जो मिले खुशी मेरे जाने से
चिरनिंद्रा में सो जाउं मैं

इक आवारा हवा चले
जब तेरे बालों को सहलाए
कोई पागल हवा का झोंका
जब तेरा आँचल छु जाये 

ना होकर भी होने का
तुझको एहसास दिलाउं मैं
जो मिले खुशी मेरे जाने से
चिरनिंद्रा में सो जाउं मैं

© नीतीश कर्ण 
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

Monday, 3 November 2014

जैसे कोई कहानी शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गयी हो

जैसे कोई कहानी
शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गयी हो
जैसे कोई स्वप्न कोई ख्वाहिशें
सिसकती रह गयी हो पहलुओं में
जैसे उन्मुक्त गगन से उड़ा ले गया हो
उस बादल को कोई आततायी हवा
ठीक उसी तरह
मेरी जिंदगी गिरी है उस आकाश से
कटी पतंग की तरह
जैसे तलाश रही हो अपनी रहनुमा कोई

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

भीड़ में भी अकेले सा एहसास क्यूँ है

भीड़ में भी अकेले सा एहसास क्यूँ है
इक तू ही तू मेरे दिल के पास क्यूँ है

खामोश सी हवायें उखड़ी सी ये फिजायें
फिर ये झंझावत सा आस-पास क्यूँ है

तेरा दिया छोटा जख्म नासूर हो गया
आज इसके दर्द में ये मिठास क्यूँ है

कहते है तेरे साथ ही बहार आती है
फिर आज हर मंज़र ही उदास क्यूँ है

जिसके नौबत से सदा रौनक थी महफिलें
आज वह इक जिंदा लाश क्यूँ है

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

इक साँवरी अच्छी लगी

चंचला स्वप्निल आँखें
सागर सी लहराती जुल्फें
वाराणसी की एक मंदिर
गंगोत्री सच्ची लगी
इक साँवरी अच्छी लगी

सीधी-साधी थोड़ी टेढ़ी
वह कोरी होठों की गाली
एक मस्त पवन इक झंझावत
दीवानगी सच्ची लगी
इक साँवरी अच्छी लगी

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

एक साँवरी नज़रें झुकाये

भोली सी नयनाभिराम
पलकों पर सपने सजाये
बैठी है कुछ उलझी उलझी
एक साँवरी नज़रें झुकाये

ना नजर लगा देना तू चंदा
मेरे संग तेरी प्रति साये
सादगी की सुन्दर मूरत
आँखों पर चश्मा लगाये

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

Sunday, 12 October 2014

सब कुछ बदल गया जीवन का, बस एक निशानी बांकी है

ख़त्म हुए अध्याय सुखद, बस एक कहानी बांकी है
सब कुछ बदल गया जीवन का, एक निशानी बांकी है

खत्म हुए वो फेनिल मदिरा, मधुशाला को जो महकाते
टूट चुके वो काँच के प्याले, दीवाने जिसको टकराते

ख़त्म हो गयी मधुशाला, खो गयी कहीं उनकी हस्ती
ख़त्म हो गये दीवाने, उजड़ गयी उनकी बस्ती

पर आज अचानक देखा उनको, नज़रों से नज़रें टकराई
शबनम की कुछ बूँदें फिसली, कमल-पंखुरी ज्यों मुस्काई

ख़त्म ही थी सारी मधुशाला, मूक नयन पहचान नयी थी
उजड़ी रंगत उलझी जुल्फें, पर मादक मुस्कान वही थी

जी भर कर तू आज पिला दे, हो सके मिले फिर मधुशाला
जिंदगी कट जाए नशे में, तू आज पिला दे वो हाला

सांसो मे घुलने दे मदिरा, कसर निकाल लेने दे पूरी
बाहों मे कस कर मरने की, तू मुझको दे दे मंज़ूरी

एक कहानी बीत गया, अब एक कहानी बांकी है
सब कुछ बदल गया जीवन का, बस एक निशानी बांकी है

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

Thursday, 2 October 2014

चलती फिरती मधुशाला

अधरों पर मुस्कान सजाये आँखों में सुरमई हाला
यौवन घट छलकाती आयी चलती फिरती मधुशाला

छक कर आज पिला दे मुझको सुर-सुधा स्वप्निल हाला
मद ऋणी रोम-रोम हो जाए तु आज पिला दे वो प्याला

कर लेने दो अरमां पूरी पैमाना भर लेने दो
तुम ही मेरी साकी सुरा हो तुम ही मेरी मधुबाला

आँखों से होकर उतरेगा सुरमई रूप का जब प्याला
जीवंत होंगे आँखों के आगे खुज़राहो की सुरबाला

रूप मधुमती तेरे नखड़े जी भर के आज उठाउंगा
मैं आवारा बंजारा तुम चलती फिरती मधुशाला

अधरों पर लेलो चुंबन तू साँसों को टकराने दो
बाहों मे कस ले मुझको धड़कन का शोर सुनाने दो

अंजुरियाँ भर-भर कर पी लूं छोड़ के चिंता जनम मरण की
मैं जनम जनम का प्यासा राही तुम चलती फिरती मधुशाला

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

Wednesday, 1 October 2014

देखा है आज मैने इक उनिन्दी आँखें

देखा है आज मैने इक उनिन्दी आँखें
बोझिल पलकें थी सपनों से शायद
जैसे रात भर जगी हो अपलक चंदा
की जैसे नज़र आई हो गुलाब के पंखुड़ियों पर फिसलती शबनम
मानो जल उठी हो रात के शबनम सवेरे-सवेरे
देखा है आज मैने इक उनिंदी आँखें
बोझिल पलकें थी सपनों से शायद...!


© नीतीश कर्ण
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Monday, 22 September 2014

अलमस्त जवानी के आगे,सब रंग जमाने के फीके

कुछ रंग है दीप दीवाली के
कछ रंग है रंग रंगोली के
कुछ रंग रंगीली दुर्गापूजा
कुछ रंग गुलाले होली के

कुछ रंग नमाजे मस्जिद के
कुछ रंग है चर्च शिवाले के
कुछ रंग है सूरज किरणों के
कुछ रंग है चाँद सितारों के

कुछ रंग अजंता मूरत की
कुछ रंग इबादत नज़रों की
कुछ रंग कविता हर्फो की
कुछ रंग है सजदा ज़ुल्फो की

कुछ रंग साकी पैमाने की
कुछ रंग जामे मैखाने की
कुछ रंग आँखों से पीने की
कुछ रंग बहक जाने की

कुछ रंग बसंती चमकीले
कुछ रंग सतरंगी पनसोखे
कुछ रंग हिना सज़ा संवरा
कुछ रंग लगे खाली खोखे

कुछ रंग लगा हल्का हल्का
कुछ रंग बहुत ही है चोखे
अलमस्त जवानी के आगे
सब रंग जमाने के फीके

© नीतीश कर्ण
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Thursday, 18 September 2014

मद्धम सी चाँदनी, हवा की सरगोशियाँ

मद्धम सी चाँदनी, हवा की सरगोशियाँ
शबनमी रात और, सुरमयी आँखें

कारी बादर के ओट से, शर्माती चंदा
जैसे चिलमन से झाँकती, मनचली आँखें

कलियों पर गिरती, क्षितिज से ओस की बुन्दे
नज़रों सी फिसलती, मरमरी आँखें

रातें अधूरी, बातें अधूरी
आमंत्रण दे रही, कोई स्वप्निल आँखें

मोम सा यौवन, और सांसो की गर्मी
झील सी गहरी, रसभरी आँखें

बयान कर रही है सिलवटें, रात की कहानियाँ
करवट बदल रही है, उनिन्दी आँखें

कभी नज़रें झुका रही है,कभी नज़रें चुरा रही है
आँचल में शर्म से, बोझिल आँखें

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)





Monday, 15 September 2014

तेरे शहर से अपने सारे राहों को मोड़ आया हुँ

तेरे शहर से अपने सारे राहों को मोड़ आया हुँ
तुझसे जुड़ी हर कसमें, रिवाजों को तोड़ आया हुँ

वो चाँद सी सुरत, वो चाँदी सी रंगत
उस गली में मस्त, ईशारों को छोड़ आया हुँ
मेरा एक मिस्ड कॉल, और तेरा आना छम से
उस नज़रों के हर ईक, नज़ारों को छोड़ आया हुँ
वो दोस्तों की महफ़िल, दिवानगी की बातें
उस छत पे चाँद, सितारों को छोड़ आया हुँ
वो सुबह की पूजा, वो शाम की इबादत
उस शहर के मस्जिद शिवालों को छोड़ आया हुँ
ऐ दोस्त गर मिल जाए, तो संभाल कर रखना
वहीं कहीं रातों की निन्द, दिन के करारों को छोड़ आया हूँ

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

बहके हुए अरमान सारे

बहके हुए अरमान सारे
तनती हुई साँसों की डोर

धड़कनों का शोर चुप-चुप, तुम सुनो ना..
घुलती हुई खुश्बु फ़िज़ा में
उरती हुई रंगत गुलाल
गाते हुए कोयल को फाग, तुम सुनो ना..
शबनमी कलियों का दामन, चटकीले चंदा का मन
रागनी का गीत चुप-चुप, तुम सुनो ना..

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)