Monday, 3 November 2014

जैसे कोई कहानी शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गयी हो

जैसे कोई कहानी
शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गयी हो
जैसे कोई स्वप्न कोई ख्वाहिशें
सिसकती रह गयी हो पहलुओं में
जैसे उन्मुक्त गगन से उड़ा ले गया हो
उस बादल को कोई आततायी हवा
ठीक उसी तरह
मेरी जिंदगी गिरी है उस आकाश से
कटी पतंग की तरह
जैसे तलाश रही हो अपनी रहनुमा कोई

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

भीड़ में भी अकेले सा एहसास क्यूँ है

भीड़ में भी अकेले सा एहसास क्यूँ है
इक तू ही तू मेरे दिल के पास क्यूँ है

खामोश सी हवायें उखड़ी सी ये फिजायें
फिर ये झंझावत सा आस-पास क्यूँ है

तेरा दिया छोटा जख्म नासूर हो गया
आज इसके दर्द में ये मिठास क्यूँ है

कहते है तेरे साथ ही बहार आती है
फिर आज हर मंज़र ही उदास क्यूँ है

जिसके नौबत से सदा रौनक थी महफिलें
आज वह इक जिंदा लाश क्यूँ है

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

इक साँवरी अच्छी लगी

चंचला स्वप्निल आँखें
सागर सी लहराती जुल्फें
वाराणसी की एक मंदिर
गंगोत्री सच्ची लगी
इक साँवरी अच्छी लगी

सीधी-साधी थोड़ी टेढ़ी
वह कोरी होठों की गाली
एक मस्त पवन इक झंझावत
दीवानगी सच्ची लगी
इक साँवरी अच्छी लगी

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

एक साँवरी नज़रें झुकाये

भोली सी नयनाभिराम
पलकों पर सपने सजाये
बैठी है कुछ उलझी उलझी
एक साँवरी नज़रें झुकाये

ना नजर लगा देना तू चंदा
मेरे संग तेरी प्रति साये
सादगी की सुन्दर मूरत
आँखों पर चश्मा लगाये

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)