तोहर परफ्यूमक सुगंध
हमर टिसट और गेरुआ सं'
गमकेने अछि सगर मन के
ओना त सोझा अछि इहो
कनिक देरक लेल ठीक तोरे जांका
फेर घुलि जायत गेरुआ के अंतर्मन में
जेना की तू हमर आत्मा में
© नीतीश मैथिल
गजल
चतरल आकाश , गुमसल भोर सन ।
सर्वस्व न्यौछावर करके कोई , कैसे सर्वोच्चता पा लेता है ।
सावन में अबकी याद की बरसात मुसलसल है।
आसमान में जब , गिरते तारों को देखोगी ।
तुलसी लंग धाजा फहराईते हेतै ।
होठों पर मुस्कान सजाये , आंखों में सुरमई हाला ।
जिन रातों में जग कर बोये , थे हमने कुछ स्वप्न सिंदूरी ।
गामक बसलोचना
सिरमा लग बैसल हमर निन्न
मंजिलों के हर नये सवाल में सुकून है ।
रातुक बिचला पहर
मनमे अनकहल गप्प आ
मोनक सीमा रेखा
जगते रहना सपने बुनना
हम सरिता चंचल निर्झर
हम गंगा पावन अविरल