Thursday, 2 October 2014

चलती फिरती मधुशाला

अधरों पर मुस्कान सजाये आँखों में सुरमई हाला
यौवन घट छलकाती आयी चलती फिरती मधुशाला

छक कर आज पिला दे मुझको सुर-सुधा स्वप्निल हाला
मद ऋणी रोम-रोम हो जाए तु आज पिला दे वो प्याला

कर लेने दो अरमां पूरी पैमाना भर लेने दो
तुम ही मेरी साकी सुरा हो तुम ही मेरी मधुबाला

आँखों से होकर उतरेगा सुरमई रूप का जब प्याला
जीवंत होंगे आँखों के आगे खुज़राहो की सुरबाला

रूप मधुमती तेरे नखड़े जी भर के आज उठाउंगा
मैं आवारा बंजारा तुम चलती फिरती मधुशाला

अधरों पर लेलो चुंबन तू साँसों को टकराने दो
बाहों मे कस ले मुझको धड़कन का शोर सुनाने दो

अंजुरियाँ भर-भर कर पी लूं छोड़ के चिंता जनम मरण की
मैं जनम जनम का प्यासा राही तुम चलती फिरती मधुशाला

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

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