Wednesday, 1 October 2014

देखा है आज मैने इक उनिन्दी आँखें

देखा है आज मैने इक उनिन्दी आँखें
बोझिल पलकें थी सपनों से शायद
जैसे रात भर जगी हो अपलक चंदा
की जैसे नज़र आई हो गुलाब के पंखुड़ियों पर फिसलती शबनम
मानो जल उठी हो रात के शबनम सवेरे-सवेरे
देखा है आज मैने इक उनिंदी आँखें
बोझिल पलकें थी सपनों से शायद...!


© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

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