Monday, 3 November 2014

भीड़ में भी अकेले सा एहसास क्यूँ है

भीड़ में भी अकेले सा एहसास क्यूँ है
इक तू ही तू मेरे दिल के पास क्यूँ है

खामोश सी हवायें उखड़ी सी ये फिजायें
फिर ये झंझावत सा आस-पास क्यूँ है

तेरा दिया छोटा जख्म नासूर हो गया
आज इसके दर्द में ये मिठास क्यूँ है

कहते है तेरे साथ ही बहार आती है
फिर आज हर मंज़र ही उदास क्यूँ है

जिसके नौबत से सदा रौनक थी महफिलें
आज वह इक जिंदा लाश क्यूँ है

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

No comments:

Post a Comment