Wednesday, 10 September 2014

किया हम प्रीत लगेलहुँ

कोना सुनाबु हाल बिरह के नोर आँखि में आबईये
करेज मे एकता हुक उठल आ प्राण ठोर ताक आबईये

जानि कोन अपराध केलहु हम, जेकर सजा देलहु आहां हमरा
जिनगी हमर ओई फूल जाकाँ भेल, जेकर रस चुसलक कोनो भंवरा

निश्चहि घोर अपराध हमर छल, जे हम नेह लगेलहुँ
आब अहु सs बढी क सजा देब कि, जिबैत जान लs लेलहुँ

आबि गेल फेर आमक महिना, जखने गाछी में महुआ गमकल
हरियर भेल बेमाय करेजक, सुनबा सs कोयली के कु-कल

नैन बिछेने आइयो बाट पर, पैरा अहिं के तकैत छी
मन पता नै कतs लटकल अछि, नै सुतई छी नै जागई छी

ओहि अतीत मे तकबा के, हम अखनेहु इच्छा रखने छी
मुदा देह हमर सिहरी उठइये, जखन गप्प आहा के करैत छी

किछु बुईझ नै आबि पडेयै एहन कोन जुलुम हम केलहुँ
सभहे किछु गेल हराए, किया हम प्रीत लगेलहुँ

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

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