Monday, 15 September 2014

तेरे शहर से अपने सारे राहों को मोड़ आया हुँ

तेरे शहर से अपने सारे राहों को मोड़ आया हुँ
तुझसे जुड़ी हर कसमें, रिवाजों को तोड़ आया हुँ

वो चाँद सी सुरत, वो चाँदी सी रंगत
उस गली में मस्त, ईशारों को छोड़ आया हुँ
मेरा एक मिस्ड कॉल, और तेरा आना छम से
उस नज़रों के हर ईक, नज़ारों को छोड़ आया हुँ
वो दोस्तों की महफ़िल, दिवानगी की बातें
उस छत पे चाँद, सितारों को छोड़ आया हुँ
वो सुबह की पूजा, वो शाम की इबादत
उस शहर के मस्जिद शिवालों को छोड़ आया हुँ
ऐ दोस्त गर मिल जाए, तो संभाल कर रखना
वहीं कहीं रातों की निन्द, दिन के करारों को छोड़ आया हूँ

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

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