समंदर की लहर की तरह
जो उठती है उपर की ओर रह-रह कर
मानो छुना चाहता हो चाँद को
वैसे तो स्पर्श करती है रोज ही उसकी रश्मियाँ
ठीक उनकी यादों की तरह
कुछ भी तो अंतर नही
उस पगली लहर और मुझमे
मैं भी रह रह कर उठता हुँ
पूरे उमंग से उस लहर की तरह
और फिर थक कर गिरता हुँ नीचे
खो जाता हूँ अतीत के समंदर में
© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)
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