Thursday, 18 September 2014

मद्धम सी चाँदनी, हवा की सरगोशियाँ

मद्धम सी चाँदनी, हवा की सरगोशियाँ
शबनमी रात और, सुरमयी आँखें

कारी बादर के ओट से, शर्माती चंदा
जैसे चिलमन से झाँकती, मनचली आँखें

कलियों पर गिरती, क्षितिज से ओस की बुन्दे
नज़रों सी फिसलती, मरमरी आँखें

रातें अधूरी, बातें अधूरी
आमंत्रण दे रही, कोई स्वप्निल आँखें

मोम सा यौवन, और सांसो की गर्मी
झील सी गहरी, रसभरी आँखें

बयान कर रही है सिलवटें, रात की कहानियाँ
करवट बदल रही है, उनिन्दी आँखें

कभी नज़रें झुका रही है,कभी नज़रें चुरा रही है
आँचल में शर्म से, बोझिल आँखें

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)





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