जिन रातों में जग कर बोये , थे हमने कुछ स्वप्न सिंदूरी ।
उन रातों में स्वप्निल आंखें , चुपके चुपके रो लेते हैं ।
जिन आंखों की क्यारी को , सींचा था हमने साँसों से ।
उन मुरझाये कलियों के , उपवन में हम खो लेते हैं ।
जिसके रंग में हमने , रंग डाला था अपना तनमन ।
प्रेम के गहरे दाग सभी , उस दिव्य रंग में धो लेते हैं ।
© नीतीश मैथिल
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