सर्वस्व न्यौछावर करके कोई , कैसे सर्वोच्चता पा लेता है ।
अपनी बिरहा भूल के कैसे , औरों के खुशियों पे गा लेता है ।
कैसे कोई भुला देता , दिल भेदने वाले दारुण क्षण ।
कैसे कोई मना लेता , बोझिल पलकें टूटे मन ।
दिव्य सरल पर , मूक सी अविचल ।
छटा बिखेरती , हर छिन हर पल ।
गम की दाग छुपाती चंदा , तारों की झुरमुट में ।
© नीतीश कर्ण
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