Tuesday, 25 May 2021

मनमे अनकहल गप्प आ

 मनमे अनकहल गप्प आ

मुट्ठी में दबने हुनक न'हक चेन्ह
ल' क' चलल इ बतहा मन गंगाक ओहि पार
हमर चलिते त' सजा लितहुँ
महादेव जेकाँ माथ पर अपन गंगाके
नहि त' भागीरथ बनि उतारि लितहुँ अपन अंगना में!

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