होठों पर मुस्कान सजाये , आंखों में सुरमई हाला ।
लिड लगाये कानों में , हाथों में कॉफ़ी का प्याला ।
पलकें मींचे इठलाती , चंचल चपला इतराती ।
बड़े दिनों के बाद दिखी है , चलती फिरती मधुशाला ।
छक कर आज पीने दो मुझको , सुर-सुधा स्वप्निल हाला ।
मद ऋणि रोम रोम हो जाये ,आज पिला दो वो प्याला ।
कर लेने दो अरमां पूरी , पैमाना भर लेने दो ।
जाने फिर कब दर्शन होंगे , चलती फिरती मधुशाला ।
आंखों से होकर उतरेगा , मोहिनी रूप का जब प्याला ।
जीवंत होंगे आंखों के आगे , खजुराहो की सुरबाला ।
रूप मधुमती तेरे नखरे , जी भर के आज उठाऊंगा ।
मैं आवारा बंजारा हुँ तुम , चलती फिरती मधुशाला ।
साँसों के निज करतल ध्वनि से , गूंज रहा मन मतवाला ।
यौवन घट छलकाती फिरती , अधरों से मधुबाला ।
अंजुरियाँ भर भर के पी लूं , छोड़ के चिंता ध्येय धर्म की ।
मैं जनम जनम का प्यासा राही , तुम चलती फिरती मधुशाला ।
कितने मौसम आये गये , ना छुआ कभी मधु का प्याला ।
गम का वेग या भावुक क्षण में , ना खुला कभी मन का ताला ।
किसी खुशी में जश्न मनाने , क्यों जाऊं मदिरालय मैं ।
बालकनी में दिख जाती जब , चलती फिरती मधुशाला ।
© Nitish Maithil
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