गामक बसलोचना
लिखैत अछि कविता
खेतक' पन्ना पर
कोदाइरक कलम सँ
उताईर दैत अछि
अपन परिकल्पना
उसर जमीन पर
आ फूँकि दैत छै जान
अपन घाम सँ
सिमसल एकहकटा द'ल मे।
अपन विधा मे
जेना निपुण कवि
करैत अछि
एकटा जीवंत चित्रण
अपन शब्दक वितान सँ!
© नीतीश मैथिल
गामक बसलोचना
सिरमा लग बैसल हमर निन्न
मंजिलों के हर नये सवाल में सुकून है ।
रातुक बिचला पहर
मनमे अनकहल गप्प आ
मोनक सीमा रेखा
जगते रहना सपने बुनना
हम सरिता चंचल निर्झर
हम गंगा पावन अविरल