Tuesday, 25 May 2021

जिन रातों में जग कर बोये , थे हमने कुछ स्वप्न सिंदूरी ।

 जिन रातों में जग कर बोये , थे हमने कुछ स्वप्न सिंदूरी ।

उन रातों में स्वप्निल आंखें , चुपके चुपके रो लेते हैं ।
जिन आंखों की क्यारी को , सींचा था हमने साँसों से ।
उन मुरझाये कलियों के , उपवन में हम खो लेते हैं ।
जिसके रंग में हमने , रंग डाला था अपना तनमन ।
प्रेम के गहरे दाग सभी , उस दिव्य रंग में धो लेते हैं ।
© नीतीश मैथिल

गामक बसलोचना

 गामक बसलोचना

लिखैत अछि कविता
खेतक' पन्ना पर
कोदाइरक कलम सँ
उताईर दैत अछि
अपन परिकल्पना
उसर जमीन पर
आ फूँकि दैत छै जान
अपन घाम सँ
सिमसल एकहकटा द'ल मे।
अपन विधा मे
जेना निपुण कवि
करैत अछि
एकटा जीवंत चित्रण
अपन शब्दक वितान सँ!
© नीतीश मैथिल

घूम' चाहैत छी

घूम' चाहैत छी
कश्मीर सँ कन्याकुमारी धैर तोरा संग ।
देख' चाहैत छी
ट्रेनक खिड़किक सोझा
बसात सँ झुलैत तोहर झुमका
सरियाब' चाहैत छी
उरियाइत तोहर केश
आ समेट लेब' चाहैत छि
अपन तरहत्थी पर
एक शहरक बरखा
दोसर शहरक रउदी लेल ।
खुआब' चाहैत छी तोरा
माए हाथक दैलपुरी
महसूस कर' चाहैत छि
सहटैत पायलक सर्द
आ घुलि जाए चाहैत छि
तोहर लहठिक पसरल गमक मे ।
जिब' चाहैत छि सब लोकरंग
सब विविधता
"स्माइल प्लीज" संग
क्लिक कर' चाहैत छि तोहर फोटो
केसरक बगान मे
आ छिट देब चाहैत छि तोरा पर
थोरेक सिनुरिया रंग
ललौन सुरुज सँ माँगि
कन्याकुमारिक घाट पर ।
© नीतीश मैथिल

सिरमा लग बैसल हमर निन्न

 सिरमा लग बैसल हमर निन्न

हेरैत फोनक गैलरी
बिछैत आहाँक ईयाद
ख'ने असगन्नी पर झुलैत
महसूस करैत हमर अकुलाहटि
ख'ने देखैत हमर बखराके स्वप्न
गेरुआ पर औंघाईत
© Nitish Maithil

मंजिलों के हर नये सवाल में सुकून है

 मंजिलों के हर नये सवाल में सुकून है ।

कर्म पथ पे आये हर बवाल में सुकून है ।
खौलने से ही अगर लायेगी रंग जिंदगी ।
चाय की तरह हर उबाल में सुकून है ।
© Nitish Karn

रातुक बिचला पहर

 रातुक बिचला पहर

बरेरीक करकराहट सँ
अकचकाईत हमर एकाकी
फट्टकसँ आवैत हवा में
सहटैत तोहर स्पर्श
लावणि पर
झलफलाईत तोहर बिंब
और दुरखाके सन्नाटा में
अभरैत तोहर पदचाप
ओह ! ई अधिरतिया
और बतहा मन ।
© Nitish Karn

तोहर एक नजरि हमरा लेल ।

 तोहर एक नजरि हमरा लेल ।

जेना जेठक तरासल धरती
तृप्त भेल होयक
आर्द्रा के पहिल अछार सँ' ।

मनमे अनकहल गप्प आ

 मनमे अनकहल गप्प आ

मुट्ठी में दबने हुनक न'हक चेन्ह
ल' क' चलल इ बतहा मन गंगाक ओहि पार
हमर चलिते त' सजा लितहुँ
महादेव जेकाँ माथ पर अपन गंगाके
नहि त' भागीरथ बनि उतारि लितहुँ अपन अंगना में!

मोनक सीमा रेखा

 मोनक सीमा रेखा

अनंत आकाश जेना
आ ओई अनंत सागर में
मेघक नाह पर
झिझिर कोना खेलाइत हम तौं
भुलकैत सिहरैत लहरिके झिंसी स'
हाथ धेने एक दोसरक जोर सँ कसि क' ।

जगते रहना सपने बुनना

 जगते रहना सपने बुनना

बातें करना तकिये से ।
आते जाते सांसे गिनना
प्यार में हमने ये पाया है ।
© Nitish Karn

हम सरिता चंचल निर्झर

 हम सरिता चंचल निर्झर

हम गंगा पावन अविरल

हम कमला के शीत पवन
हम कुशहा सन रौद्र अटल!
Nitish Karn

क्षितिज के कोने से

 क्षितिज के कोने से पूरी चाँद..

निहारती अनवरत अधूरी ख्वाहिशों को ।

Thursday, 21 December 2017

तोहर परफ्यूमक सुगंध

तोहर परफ्यूमक सुगंध
हमर टिसट और गेरुआ सं'
गमकेने अछि सगर मन के

ओना त सोझा अछि इहो
कनिक देरक लेल ठीक तोरे जांका
फेर घुलि जायत गेरुआ के अंतर्मन में
जेना की तू हमर आत्मा में
© नीतीश कर्ण