Tuesday, 25 May 2021

तोहर नेहक इजोरिया पसारि लितियौ

 गजल

तोहर नेहक इजोरिया पसारि लितियौ
मोनक आंगनमे चन्दा उतारि लितियौ
तोरा बूझल छौ तोहर मुस्की खातिर
अपन दुनियाँ हम अपनेसँ उजारि लितियौ
अकानल सन तूँ सब रूसल मनोरथ छै
सब टा रचि-रचि सेहन्ता पखारि लितियौ
तूँ तकिते नै घुरि जों महफा ओहारसँ
सांस हृदयमे अटकल हम ससारि लितियौ
नै देखितौं तोहर हम कहियो मुँह मलिन
सब पीरितियाके खिस्सा बिसारि लितियौ
बहरे मीर (2x11)
✍️ नीतीश कर्ण

चतरल आकाश , गुमसल भोर सन ।

 चतरल आकाश , गुमसल भोर सन ।

मलिन चान केर मुँह , चकोर सन ।
पसरल राति बितैत , फोनक इंतजार में ।
सिहकैत बसात , अगबे इन्होर सन ।
© नीतीश कर्ण

सर्वस्व न्यौछावर करके कोई , कैसे सर्वोच्चता पा लेता है ।

 सर्वस्व न्यौछावर करके कोई , कैसे सर्वोच्चता पा लेता है ।

अपनी बिरहा भूल के कैसे , औरों के खुशियों पे गा लेता है ।
कैसे कोई भुला देता , दिल भेदने वाले दारुण क्षण ।
कैसे कोई मना लेता , बोझिल पलकें टूटे मन ।
दिव्य सरल पर , मूक सी अविचल ।
छटा बिखेरती , हर छिन हर पल ।
गम की दाग छुपाती चंदा , तारों की झुरमुट में ।
© नीतीश कर्ण

सावन में अबकी याद की बरसात मुसलसल है।

 सावन में अबकी याद की बरसात मुसलसल है।

दिल के हरेक कोने में कुछ अजीब सी हलचल है ।
इतनी हिम्मत कहाँ की हिमाकत करूँ तुझे पाने की।
इक तेरे नाम के होने से ही मेरा इश्क़ मुकम्मल है।
© नीतीश कर्ण

आधे-अधूरे सुनहरे ख्वाबों वाली जिंदगी ।

आधे-अधूरे सुनहरे ख्वाबों वाली जिंदगी ।
सिरहाने से लिपटी किताबों वाली जिंदगी ।
मेरा एक कॉल और उनका आना छम से ।
बालकनी से मस्त नजारों वाली जिंदगी ।
उनिन्दी आंखें और बिखरी जुल्फें ।
उस गली में चाँद सितारों वाली जिंदगी ।
तमाम उम्र निकल जाये शायद ही चुका पायें ।
उनके मुस्कुराहट की ये कर्जदारों वाली जिंदगी ।
साथ चलना मगर ना किस्मत में मिलना ।
नदी के दोनों किनारों वाली जिंदगी ।
© नीतीश कर्ण

आसमान में जब , गिरते तारों को देखोगी ।

 आसमान में जब , गिरते तारों को देखोगी ।

बादल के पीछे चंदा के , अभिसारों को देखोगी ।
घुप्प अंधेरी रातों में जब , जुगनू तुम्हें चिढायेगी ।
तीन बजे सुबह में जब , कॉफी की तलब सतायेगी ।
तब आंखें नम कर जाऊंगा ।
हाँ याद बहुत मैं आऊँगा ।
अपने बिखरे बालों को , तुम जब कभी संवारोगी ।
अपने गर्दन के तिल को , तुम जब कभी निहारोगी ।
तेरी प्यारी हंसी पर , जब कोई तारीफ सुनायेगा ।
गुनगुन करके भँवरा , जब कोई मंडरायेगा ।
तब आंखें नम कर जाऊँगा ।
हाँ याद बहुत मैं आऊँगा ।
© नीतीश कर्ण

तुलसी लंग धाजा फहराईते हेतै ।

 तुलसी लंग धाजा फहराईते हेतै ।

अंगना के अरहुल फुलाईते हेतै ।
मोन गामे में छोड़ि एलहुँ परदेश हम ।
कतहु गाछी बिरछि में बौआइते हेतै ।
© नीतीश मैथिल

होठों पर मुस्कान सजाये

 होठों पर मुस्कान सजाये , आंखों में सुरमई हाला ।

लिड लगाये कानों में , हाथों में कॉफ़ी का प्याला ।
पलकें मींचे इठलाती , चंचल चपला इतराती ।
बड़े दिनों के बाद दिखी है , चलती फिरती मधुशाला ।
छक कर आज पीने दो मुझको , सुर-सुधा स्वप्निल हाला ।
मद ऋणि रोम रोम हो जाये ,आज पिला दो वो प्याला ।
कर लेने दो अरमां पूरी , पैमाना भर लेने दो ।
जाने फिर कब दर्शन होंगे , चलती फिरती मधुशाला ।
आंखों से होकर उतरेगा , मोहिनी रूप का जब प्याला ।
जीवंत होंगे आंखों के आगे , खजुराहो की सुरबाला ।
रूप मधुमती तेरे नखरे , जी भर के आज उठाऊंगा ।
मैं आवारा बंजारा हुँ तुम , चलती फिरती मधुशाला ।
साँसों के निज करतल ध्वनि से , गूंज रहा मन मतवाला ।
यौवन घट छलकाती फिरती , अधरों से मधुबाला ।
अंजुरियाँ भर भर के पी लूं , छोड़ के चिंता ध्येय धर्म की ।
मैं जनम जनम का प्यासा राही , तुम चलती फिरती मधुशाला ।
कितने मौसम आये गये , ना छुआ कभी मधु का प्याला ।
गम का वेग या भावुक क्षण में , ना खुला कभी मन का ताला ।
किसी खुशी में जश्न मनाने , क्यों जाऊं मदिरालय मैं ।
बालकनी में दिख जाती जब , चलती फिरती मधुशाला ।
© Nitish Maithil

जिन रातों में जग कर बोये , थे हमने कुछ स्वप्न सिंदूरी ।

 जिन रातों में जग कर बोये , थे हमने कुछ स्वप्न सिंदूरी ।

उन रातों में स्वप्निल आंखें , चुपके चुपके रो लेते हैं ।
जिन आंखों की क्यारी को , सींचा था हमने साँसों से ।
उन मुरझाये कलियों के , उपवन में हम खो लेते हैं ।
जिसके रंग में हमने , रंग डाला था अपना तनमन ।
प्रेम के गहरे दाग सभी , उस दिव्य रंग में धो लेते हैं ।
© नीतीश मैथिल

गामक बसलोचना

 गामक बसलोचना

लिखैत अछि कविता
खेतक' पन्ना पर
कोदाइरक कलम सँ
उताईर दैत अछि
अपन परिकल्पना
उसर जमीन पर
आ फूँकि दैत छै जान
अपन घाम सँ
सिमसल एकहकटा द'ल मे।
अपन विधा मे
जेना निपुण कवि
करैत अछि
एकटा जीवंत चित्रण
अपन शब्दक वितान सँ!
© नीतीश मैथिल

घूम' चाहैत छी

घूम' चाहैत छी
कश्मीर सँ कन्याकुमारी धैर तोरा संग ।
देख' चाहैत छी
ट्रेनक खिड़किक सोझा
बसात सँ झुलैत तोहर झुमका
सरियाब' चाहैत छी
उरियाइत तोहर केश
आ समेट लेब' चाहैत छि
अपन तरहत्थी पर
एक शहरक बरखा
दोसर शहरक रउदी लेल ।
खुआब' चाहैत छी तोरा
माए हाथक दैलपुरी
महसूस कर' चाहैत छि
सहटैत पायलक सर्द
आ घुलि जाए चाहैत छि
तोहर लहठिक पसरल गमक मे ।
जिब' चाहैत छि सब लोकरंग
सब विविधता
"स्माइल प्लीज" संग
क्लिक कर' चाहैत छि तोहर फोटो
केसरक बगान मे
आ छिट देब चाहैत छि तोरा पर
थोरेक सिनुरिया रंग
ललौन सुरुज सँ माँगि
कन्याकुमारिक घाट पर ।
© नीतीश मैथिल

सिरमा लग बैसल हमर निन्न

 सिरमा लग बैसल हमर निन्न

हेरैत फोनक गैलरी
बिछैत आहाँक ईयाद
ख'ने असगन्नी पर झुलैत
महसूस करैत हमर अकुलाहटि
ख'ने देखैत हमर बखराके स्वप्न
गेरुआ पर औंघाईत
© Nitish Maithil

मंजिलों के हर नये सवाल में सुकून है

 मंजिलों के हर नये सवाल में सुकून है ।

कर्म पथ पे आये हर बवाल में सुकून है ।
खौलने से ही अगर लायेगी रंग जिंदगी ।
चाय की तरह हर उबाल में सुकून है ।
© Nitish Karn