रातुक बिचला पहर
बरेरीक करकराहट सँ
अकचकाईत हमर एकाकी
फट्टकसँ आवैत हवा में
सहटैत तोहर स्पर्श
लावणि पर
झलफलाईत तोहर बिंब
और दुरखाके सन्नाटा में
अभरैत तोहर पदचाप
ओह ! ई अधिरतिया
और बतहा मन ।
© Nitish Karn
रातुक बिचला पहर
मनमे अनकहल गप्प आ
मोनक सीमा रेखा
जगते रहना सपने बुनना
हम सरिता चंचल निर्झर
हम गंगा पावन अविरल