Tuesday, 25 May 2021

हम सरिता चंचल निर्झर

 हम सरिता चंचल निर्झर

हम गंगा पावन अविरल

हम कमला के शीत पवन
हम कुशहा सन रौद्र अटल!
Nitish Karn

क्षितिज के कोने से

 क्षितिज के कोने से पूरी चाँद..

निहारती अनवरत अधूरी ख्वाहिशों को ।

Thursday, 21 December 2017

तोहर परफ्यूमक सुगंध

तोहर परफ्यूमक सुगंध
हमर टिसट और गेरुआ सं'
गमकेने अछि सगर मन के

ओना त सोझा अछि इहो
कनिक देरक लेल ठीक तोरे जांका
फेर घुलि जायत गेरुआ के अंतर्मन में
जेना की तू हमर आत्मा में
© नीतीश कर्ण

एतबे मनोरथ तोरा संगे

एतबे मनोरथ तोरा संगे
तोरा संग सब दिया-बाती
तोरे स' आशा परिभाषा
तोरे संग सब सांझी पराती

तू आशीर्वाद बैजू बाबा के
तू त्रिवेणीक घाट हमर
तुंही धर्म और तुंही ध्येय
तू छे जिनगीक बाट हमर

तुंही हमर सकल साधना
तोरा बिनु जिनगी वीरान
तूंही सबटा करम पूण्य
तुंही हमर गंगा स्नान

© नीतीश कर्ण

Friday, 21 April 2017

और तुम

इक चुटकी चाँद
इक कतरा बारिश
थोड़ी सी चांदनी
और तुम


इक मुठ्ठी आंगन
थोड़ा सा बचपन
माँ का आँचल
और तुम

©नीतीश कर्ण

Thursday, 21 July 2016

नहुएं नहुएं

नहुएं नहुएं फेर तेजी
गालक ढलान सं'
टघरैत नोर
भिजबैत गेरुआ के पोरे-पोर

दलानक डिबिया सन
झिलमिलाईत जिनगी
गुंजैत सिसकी
गुज्ज अन्हार में चहुँओर

© नीतीश कर्ण
(लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

Wednesday, 29 June 2016

जाती हो तो जाओ ...

मौसम बेवक्त ही बरसेंगे 
नैन दरश को तरसेंगे 
मौन जुबां बस रह जायेगा 
जाती हो तो जाओ ...

स्वप्निल आँखें सूने होंगे 
जिवन किसलय मुर्झायेंगे 
शबनम को तृण तरसेगा 
जाती हो तो जाओ ...

खाली करवट रातें होगी 
बेनूर सिलवट सौगातें होगी 
बाती संग दिल भी जलेगा 
जाती हो तो जाओ ...

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

Thursday, 13 August 2015

तेरी होठों पे अटकी वो पानी की बूंदें

तेरी होठों पे अटकी वो पानी की बूंदें
और अंगुली से हटाना तेरा

नजरें झुका के मुस्कुराना धीरे से
फिर हौले शर्माना तेरा
© नीतीश कर्ण
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Thursday, 26 February 2015

इक सांवरी की तिरछी निगाहें

नील वसन में लिपटी हुई मद भरी चंचल अदायें
वृन्दावन की रासलीला इक सांवरी की तिरछी निगाहें

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

Saturday, 10 January 2015

शाम होते ही यादों की शमा जल जाती है

शाम होते ही यादों की शमा जल जाती है
जिंदगी के कारवाँ को रौशनी मिल जाती है
रात होते ही महक जाती है चंपा बेलियां
ये चाँदनी नवयौवना सी कर रही अठखेलियां

© नीतीश कर्ण
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Sunday, 4 January 2015

सतरंगी सपने किसलय का

बेजान जान मन चैन है खोया
मद्धम है स्पंद हृदय का

साँसों की सरगम होठों से
करती है विनय प्रणय का

आह्लादित कर देती मन को
कुछ जानी अंजानी बातें

रोमांचित कर देती तन को
सतरंगी सपने किसलय का

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)
07-06-2008

Friday, 2 January 2015

मन की सीमा रेखा

मन की सीमा रेखा
आकाश सा अनंत
और उस अनंत सागर में
बादलों की कश्ती पर
हिचकोले खाते हुए हम तुम
रोमांचित होते हुये
लहरों के थपेड़ो से
हाथ थामे हुये एक दुसरे का
ज़ोर से कस कर

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)



देकर अश्क आँखों में हंसायेगा कौन

देकर अश्क आँखों में हंसायेगा कौन
रूठ जाउं अगर मैं तो मनायेगा कौन

बालों की तरह उलझी उलझने सारी
मैं गर चला गया तो सुलझायेगा कौन

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)