Thursday, 21 July 2016

नहुएं नहुएं

नहुएं नहुएं फेर तेजी
गालक ढलान सं'
टघरैत नोर
भिजबैत गेरुआ के पोरे-पोर

दलानक डिबिया सन
झिलमिलाईत जिनगी
गुंजैत सिसकी
गुज्ज अन्हार में चहुँओर

© नीतीश कर्ण
(लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

Wednesday, 29 June 2016

जाती हो तो जाओ ...

मौसम बेवक्त ही बरसेंगे 
नैन दरश को तरसेंगे 
मौन जुबां बस रह जायेगा 
जाती हो तो जाओ ...

स्वप्निल आँखें सूने होंगे 
जिवन किसलय मुर्झायेंगे 
शबनम को तृण तरसेगा 
जाती हो तो जाओ ...

खाली करवट रातें होगी 
बेनूर सिलवट सौगातें होगी 
बाती संग दिल भी जलेगा 
जाती हो तो जाओ ...

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

Thursday, 13 August 2015

तेरी होठों पे अटकी वो पानी की बूंदें

तेरी होठों पे अटकी वो पानी की बूंदें
और अंगुली से हटाना तेरा

नजरें झुका के मुस्कुराना धीरे से
फिर हौले शर्माना तेरा
© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

Thursday, 26 February 2015

इक सांवरी की तिरछी निगाहें

नील वसन में लिपटी हुई मद भरी चंचल अदायें
वृन्दावन की रासलीला इक सांवरी की तिरछी निगाहें

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

Saturday, 10 January 2015

शाम होते ही यादों की शमा जल जाती है

शाम होते ही यादों की शमा जल जाती है
जिंदगी के कारवाँ को रौशनी मिल जाती है
रात होते ही महक जाती है चंपा बेलियां
ये चाँदनी नवयौवना सी कर रही अठखेलियां

© नीतीश कर्ण
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Sunday, 4 January 2015

सतरंगी सपने किसलय का

बेजान जान मन चैन है खोया
मद्धम है स्पंद हृदय का

साँसों की सरगम होठों से
करती है विनय प्रणय का

आह्लादित कर देती मन को
कुछ जानी अंजानी बातें

रोमांचित कर देती तन को
सतरंगी सपने किसलय का

© नीतीश कर्ण
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07-06-2008

Friday, 2 January 2015

मन की सीमा रेखा

मन की सीमा रेखा
आकाश सा अनंत
और उस अनंत सागर में
बादलों की कश्ती पर
हिचकोले खाते हुए हम तुम
रोमांचित होते हुये
लहरों के थपेड़ो से
हाथ थामे हुये एक दुसरे का
ज़ोर से कस कर

© नीतीश कर्ण
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देकर अश्क आँखों में हंसायेगा कौन

देकर अश्क आँखों में हंसायेगा कौन
रूठ जाउं अगर मैं तो मनायेगा कौन

बालों की तरह उलझी उलझने सारी
मैं गर चला गया तो सुलझायेगा कौन

© नीतीश कर्ण
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Saturday, 13 December 2014

चिरनिंद्रा में सो जाउं मैं

तेरे घर की रौशन खातिर
बाती बन जल जाउं मैं
जो मिले खुशी मेरे जाने से
चिरनिंद्रा में सो जाउं मैं

इक आवारा हवा चले
जब तेरे बालों को सहलाए
कोई पागल हवा का झोंका
जब तेरा आँचल छु जाये 

ना होकर भी होने का
तुझको एहसास दिलाउं मैं
जो मिले खुशी मेरे जाने से
चिरनिंद्रा में सो जाउं मैं

© नीतीश कर्ण 
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

Monday, 3 November 2014

जैसे कोई कहानी शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गयी हो

जैसे कोई कहानी
शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गयी हो
जैसे कोई स्वप्न कोई ख्वाहिशें
सिसकती रह गयी हो पहलुओं में
जैसे उन्मुक्त गगन से उड़ा ले गया हो
उस बादल को कोई आततायी हवा
ठीक उसी तरह
मेरी जिंदगी गिरी है उस आकाश से
कटी पतंग की तरह
जैसे तलाश रही हो अपनी रहनुमा कोई

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

भीड़ में भी अकेले सा एहसास क्यूँ है

भीड़ में भी अकेले सा एहसास क्यूँ है
इक तू ही तू मेरे दिल के पास क्यूँ है

खामोश सी हवायें उखड़ी सी ये फिजायें
फिर ये झंझावत सा आस-पास क्यूँ है

तेरा दिया छोटा जख्म नासूर हो गया
आज इसके दर्द में ये मिठास क्यूँ है

कहते है तेरे साथ ही बहार आती है
फिर आज हर मंज़र ही उदास क्यूँ है

जिसके नौबत से सदा रौनक थी महफिलें
आज वह इक जिंदा लाश क्यूँ है

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

इक साँवरी अच्छी लगी

चंचला स्वप्निल आँखें
सागर सी लहराती जुल्फें
वाराणसी की एक मंदिर
गंगोत्री सच्ची लगी
इक साँवरी अच्छी लगी

सीधी-साधी थोड़ी टेढ़ी
वह कोरी होठों की गाली
एक मस्त पवन इक झंझावत
दीवानगी सच्ची लगी
इक साँवरी अच्छी लगी

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

एक साँवरी नज़रें झुकाये

भोली सी नयनाभिराम
पलकों पर सपने सजाये
बैठी है कुछ उलझी उलझी
एक साँवरी नज़रें झुकाये

ना नजर लगा देना तू चंदा
मेरे संग तेरी प्रति साये
सादगी की सुन्दर मूरत
आँखों पर चश्मा लगाये

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)