Saturday, 13 December 2014

चिरनिंद्रा में सो जाउं मैं

तेरे घर की रौशन खातिर
बाती बन जल जाउं मैं
जो मिले खुशी मेरे जाने से
चिरनिंद्रा में सो जाउं मैं

इक आवारा हवा चले
जब तेरे बालों को सहलाए
कोई पागल हवा का झोंका
जब तेरा आँचल छु जाये 

ना होकर भी होने का
तुझको एहसास दिलाउं मैं
जो मिले खुशी मेरे जाने से
चिरनिंद्रा में सो जाउं मैं

© नीतीश कर्ण 
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

Monday, 3 November 2014

जैसे कोई कहानी शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गयी हो

जैसे कोई कहानी
शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गयी हो
जैसे कोई स्वप्न कोई ख्वाहिशें
सिसकती रह गयी हो पहलुओं में
जैसे उन्मुक्त गगन से उड़ा ले गया हो
उस बादल को कोई आततायी हवा
ठीक उसी तरह
मेरी जिंदगी गिरी है उस आकाश से
कटी पतंग की तरह
जैसे तलाश रही हो अपनी रहनुमा कोई

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

भीड़ में भी अकेले सा एहसास क्यूँ है

भीड़ में भी अकेले सा एहसास क्यूँ है
इक तू ही तू मेरे दिल के पास क्यूँ है

खामोश सी हवायें उखड़ी सी ये फिजायें
फिर ये झंझावत सा आस-पास क्यूँ है

तेरा दिया छोटा जख्म नासूर हो गया
आज इसके दर्द में ये मिठास क्यूँ है

कहते है तेरे साथ ही बहार आती है
फिर आज हर मंज़र ही उदास क्यूँ है

जिसके नौबत से सदा रौनक थी महफिलें
आज वह इक जिंदा लाश क्यूँ है

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

इक साँवरी अच्छी लगी

चंचला स्वप्निल आँखें
सागर सी लहराती जुल्फें
वाराणसी की एक मंदिर
गंगोत्री सच्ची लगी
इक साँवरी अच्छी लगी

सीधी-साधी थोड़ी टेढ़ी
वह कोरी होठों की गाली
एक मस्त पवन इक झंझावत
दीवानगी सच्ची लगी
इक साँवरी अच्छी लगी

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

एक साँवरी नज़रें झुकाये

भोली सी नयनाभिराम
पलकों पर सपने सजाये
बैठी है कुछ उलझी उलझी
एक साँवरी नज़रें झुकाये

ना नजर लगा देना तू चंदा
मेरे संग तेरी प्रति साये
सादगी की सुन्दर मूरत
आँखों पर चश्मा लगाये

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

Sunday, 12 October 2014

सब कुछ बदल गया जीवन का, बस एक निशानी बांकी है

ख़त्म हुए अध्याय सुखद, बस एक कहानी बांकी है
सब कुछ बदल गया जीवन का, एक निशानी बांकी है

खत्म हुए वो फेनिल मदिरा, मधुशाला को जो महकाते
टूट चुके वो काँच के प्याले, दीवाने जिसको टकराते

ख़त्म हो गयी मधुशाला, खो गयी कहीं उनकी हस्ती
ख़त्म हो गये दीवाने, उजड़ गयी उनकी बस्ती

पर आज अचानक देखा उनको, नज़रों से नज़रें टकराई
शबनम की कुछ बूँदें फिसली, कमल-पंखुरी ज्यों मुस्काई

ख़त्म ही थी सारी मधुशाला, मूक नयन पहचान नयी थी
उजड़ी रंगत उलझी जुल्फें, पर मादक मुस्कान वही थी

जी भर कर तू आज पिला दे, हो सके मिले फिर मधुशाला
जिंदगी कट जाए नशे में, तू आज पिला दे वो हाला

सांसो मे घुलने दे मदिरा, कसर निकाल लेने दे पूरी
बाहों मे कस कर मरने की, तू मुझको दे दे मंज़ूरी

एक कहानी बीत गया, अब एक कहानी बांकी है
सब कुछ बदल गया जीवन का, बस एक निशानी बांकी है

© नीतीश कर्ण
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Thursday, 9 October 2014

प्रेम बयार सिहकि गेलय

गजल–3

प्रेम बयार सिहकि गेलय
मोनक पंछी चहकि गेलय

झूकल नैनकेँ उठिते धरि
धाप इज़ोर छिटकि गेलय

नैन नैनसँ मिलिते सउंसे
रातुक रानी गमकि गेलय

ओ पहिल नजरि जे हियमे
सोन सन जे चमकि गेलय

ओ छिलकैत मदिरा नैना स
नीतीश कनि बहकि गेलय

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

Thursday, 2 October 2014

चलती फिरती मधुशाला

अधरों पर मुस्कान सजाये आँखों में सुरमई हाला
यौवन घट छलकाती आयी चलती फिरती मधुशाला

छक कर आज पिला दे मुझको सुर-सुधा स्वप्निल हाला
मद ऋणी रोम-रोम हो जाए तु आज पिला दे वो प्याला

कर लेने दो अरमां पूरी पैमाना भर लेने दो
तुम ही मेरी साकी सुरा हो तुम ही मेरी मधुबाला

आँखों से होकर उतरेगा सुरमई रूप का जब प्याला
जीवंत होंगे आँखों के आगे खुज़राहो की सुरबाला

रूप मधुमती तेरे नखड़े जी भर के आज उठाउंगा
मैं आवारा बंजारा तुम चलती फिरती मधुशाला

अधरों पर लेलो चुंबन तू साँसों को टकराने दो
बाहों मे कस ले मुझको धड़कन का शोर सुनाने दो

अंजुरियाँ भर-भर कर पी लूं छोड़ के चिंता जनम मरण की
मैं जनम जनम का प्यासा राही तुम चलती फिरती मधुशाला

© नीतीश कर्ण
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Wednesday, 1 October 2014

देखा है आज मैने इक उनिन्दी आँखें

देखा है आज मैने इक उनिन्दी आँखें
बोझिल पलकें थी सपनों से शायद
जैसे रात भर जगी हो अपलक चंदा
की जैसे नज़र आई हो गुलाब के पंखुड़ियों पर फिसलती शबनम
मानो जल उठी हो रात के शबनम सवेरे-सवेरे
देखा है आज मैने इक उनिंदी आँखें
बोझिल पलकें थी सपनों से शायद...!


© नीतीश कर्ण
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Wednesday, 24 September 2014

घोघ उठिते धरि बिगरि गेलय

गजल–2

घोघ उठिते धरि बिगरि गेलय
बात सीधा जे छल ओनरि गेलय

बंद बोतल शराब जकाँ छल
ओ खुलिते जेना चहरि गेलय

रूप पछवा देखि सिहकल मोन
पोरे-पोर जेना सिहरि गेलय

मजलिस मे जिनकर चर्चा छल
ओ नजरिमे एखन उतरि गेलै

नीतीशकेँ दूरेसँ सिहावइ छल
ओ दिन छल आब गुजरि गेलय

सरल वार्णिक बहर

© नीतीश कर्ण
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Tuesday, 23 September 2014

हम छी आइ बड्ड उदास तोरा बिनु

हम छी आइ बड्ड उदास तोरा बिनु
जिनगीमे किछु नै छै खास तोरा बिनु

मुँह मोडि लेले नै घुरि कऽ तकले तूँ
दुनियासँ करब की आस तोरा बिनु

चारु दिस महले महल ऐँठाँ मुदा
एहि शहरमे नै छै बास तोरा बिनु

हिया बनि गेल अछि नीरस एहन
नै बीते दिन राति आ मास तोरा बिनु

जीविते जिनगी मरि रहल नीतीश
आगू चलत कोना ई सांस तोरा बिनु

सरल वार्णिक बहर

© नीतीश कर्ण
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Monday, 22 September 2014

अलमस्त जवानी के आगे,सब रंग जमाने के फीके

कुछ रंग है दीप दीवाली के
कछ रंग है रंग रंगोली के
कुछ रंग रंगीली दुर्गापूजा
कुछ रंग गुलाले होली के

कुछ रंग नमाजे मस्जिद के
कुछ रंग है चर्च शिवाले के
कुछ रंग है सूरज किरणों के
कुछ रंग है चाँद सितारों के

कुछ रंग अजंता मूरत की
कुछ रंग इबादत नज़रों की
कुछ रंग कविता हर्फो की
कुछ रंग है सजदा ज़ुल्फो की

कुछ रंग साकी पैमाने की
कुछ रंग जामे मैखाने की
कुछ रंग आँखों से पीने की
कुछ रंग बहक जाने की

कुछ रंग बसंती चमकीले
कुछ रंग सतरंगी पनसोखे
कुछ रंग हिना सज़ा संवरा
कुछ रंग लगे खाली खोखे

कुछ रंग लगा हल्का हल्का
कुछ रंग बहुत ही है चोखे
अलमस्त जवानी के आगे
सब रंग जमाने के फीके

© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)

Thursday, 18 September 2014

नाम मेटायल,पहिचान हरायल

नाम मेटायल,पहिचान हरायल 
समय आयब गेल, अर्जन करू
चुप रहब, इतिहास मेट जायत
शेर छी आँहा गर्जन करू !!!
© नीतीश कर्ण
(कॉपीराइट अधिनियम के अनुरूप लेखक नीतीश कर्ण के अधीन सर्वाधिकार सुरक्षित)